प्रणव-ध्यानयोग Pranav Yoga

yoga

प्रणव-ध्यानयोग Pranav Yoga

                द्रष्टा बनकर दीर्ध एवं सूक्ष्म गति से श्वास को लेते एवं छोड़ते समय श्वास की गति इतनी सूक्ष्म होनी चाहिए की स्वयं को भी श्वास की ध्वनि की अनुभूति न हो तथा यदि नासापुटों के आगे रुई भी रख दें, तो वः हिले नहीं | 
             द्रष्टा बनकर या साक्षी होकर जब एक लय के साथ श्वासों पर मन को केन्द्रित क्र देते हैं, तो प्राण स्वतः सूक्ष्म हो जाता है और १० से २० सेकेन्ड में एक बार श्वास अंदर जाता है और उतनी ही देर में श्वास बाहर निकलता है | लम्बे अभ्यास से योगी का १ मिनट में एक ही श्वास चलने लग जाता है | 
             धीरे-धीरे अभ्यास बढ़ाकर प्रयास करें की एक मिनट में एक श्वास तथा एक प्रश्वास अंदर चले | इस प्रकार श्वास को भीतर तक देखने का भी प्रयास करें प्रारम्भ में श्वास के स्पर्श की अनुभूति मात्र नासिकाग्र पर होगी, धीरे-धीरेष्वास के गहरे स्पर्श को भी अनुभव कर सकेंगे | 
             इस प्रकार कुछ समय तक श्वास के साथ द्रष्टा, अर्थार्त साक्षी भाव पूर्वक ओमकार का जाप करने से ध्यान स्वतः होने लगता है | साधक का मन अत्यंत एकाग्र तथा ओमकार में तन्मय और तदरूप होने लगता है | 
             इसे ' विपश्यना ' या प्रेक्षाध्यान भी कहते हैं ; यह पूरी तरह से ध्यानात्मक है | समाधि के अभ्यासी योगी साधक प्रणव के साथ श्वासों की इस साधना को समय की उपलब्धता के अनुसार घंटो तक भी करते हैं | इस प्रक्रिया से श्वास से किसी तरह की ध्वनि नहीं होती अर्थात यह ध्वनिरहित साधना को भीतर के गहन मौन में ले जाती है, जहाँ साधक की इन्द्रियों का मन में, मन का प्राण में, प्राण का आत्मा में और आत्मा का विश्वात्मा अथवा परमात्मा में लय हो जाता है | 

लाभ : 

  1. इससे मन अत्यंत एकाग्र तथा स्थिर होता है | साधक का चित ओमकार में तन्मय और तदरूप हो जाता है | उतम साधक ध्यान करते-करते सच्चिदानंद-स्वरूप ब्रम्ह के स्वरूप में एकरूप होता हुआ समाधी के अनुपम दिव्य आनंद को भी प्राप्त कर लेता है | 
  2. इस प्राणायाम के विधिवत निरंतर अभ्यासयोग से धारणा, ध्यान एवं समाधि के संयोग से ' संयम ' प्राप्त होता है | 

 

Post a Comment

0 Comments