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Friday, June 7, 2019

दुःख का कारण और उसका अन्त

दुःख का कारण :


  • जो तुम्हारे पास में होता है वही तुम दूसरों को बांटते हो ओर जो तुम दूसरों को देते हो वही तुम्हे वापस मिलता है यदि तुम्हारे पास प्रेम, करुणा,वात्सल्य,प्रसन्नता या खुशियाँ हो तो तुम दूसरों को भी यही बाँटोगे और दूसरों से भी यही पाओगे | और यदि क्रोध व घृणा से भरे हुए हो, तो जो बाँटोगे, वही तो पाओगे | जो बोओगे, वही काटोगे | हम बोते हैं बाबुल और परिणाम में काँटों के बदले फुल चाहते हैं, जोकि मिलते नहीं हैं और यही हमारे दुःख का कारण है |

दुःख का अन्त : 

  • हम स्वयं ही अपने सुख-दुःख के कारण हैं | यह सत्य जिस दिन हम समझ लेते हैं | उस दिन जीवन के दुःख मिट जाते हैं | यदि तुम मुस्कुराते हो तो दुनिया मुस्कुराती है, और यदि तुम मायूस, उदास, हताश व निराश होते हो तो दुनिया तुम्हें उदास सी दिखने लगती है | 
  • सुख बाहर से नहीं, भीतर से आता है | जब तुम पूर्ण मौन सुषुप्ति या एकाग्र अवस्था में होते हो तब सुख प्रकट होता है | भीतर से उतरता है | हम प्रत्येक विषय में, धर्म, ईश्वर, सत्य, सन्त, जीवन, कर्म, कर्तव्य, अकर्तव्य, पिंड एवं समग्र ब्रम्हाण्ड के प्रति अपने संचित, श्रुत, दुष्ट, अनुमानित ज्ञान के आधार पर आग्रह निर्मित क्र लेते हैं | 
  • जीवन के क्षेत्र में क्षितिज तक वे ही पंहुचते हैं जो आग्रह नही रखते | आग्रह हमे तोड़ते हैं | आग्रह अहं का मिथ्याभ्रम पैदा करते हैं, आग्रह हमे कुण्ठित एवं सकीर्ण बना देते हैं | आग्रह के टूटने पर सत्य का द्वार अनावृत होता है | अकेला ज्ञान, मात्र अहम की अभिव्यक्ति देगा | केवल ज्ञान मरुभूमि की तरह जीवन में रूखापन, मिथ्या दम्भ एवं कृत्रिम या काल्पनिक व्यक्तित्व निर्मित कर लेता है | अतः  ज्ञान की परिपूर्णता है-कर्म | बिना कर्म, केवल ज्ञान से भक्ति एक बन्धन एवं ज्ञान के बिना भक्ति एक आडमबर बन जाती है | अतः विवेकपूरक कार्य करते हुए ही हम समाधि या मुक्ति को प्राप्त क्र सकते हैं | 
  • ज्ञान से सम्यक दृष्टि मिलती है, दृष्टि पाकर उसका उपयोग कर्म एवं भक्ति में होना ही चाहिए | हर समय प्रतिपल उत्साह, ऊर्जा व् आत्मविश्वास से भरा हुआ जीवन जीओ !
  • भगवान ने महान कार्य करने के लिए तुम्हारा सूजन किया है | सामाजिक, नैतिक मूल्य, सत्य, अहिंसा, मानवता, संवेदनशीलता, चारित्रिक शुचिता एवं सहिष्णुता से विश्वकल्याण होगा, दुनिया सुखी होगी, इससे पहले यह भी मत भूलो की यदि तुमने इन नैतिक मूल्यों में आस्था व् निष्ठां नहीं रखी तो तुम वैयक्तिक जीवन में कभी सुखी नहीं रह सकते हो |  

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